Tuesday, 17 July 2012

Rangin

अपनी रंगीन मिज़ाजी के चलते आज मैं रँग की बात करूँगा।

रंग चढ़ते हैं, रँग उतरते हैं।.
रंग प्रतिनिधि हमारे बनते हैं।
लाल, नीले, तिरंगे, केसरिया,
अब सभी रंग रँग बदलते हैं।

विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ इसलिए जानता हूँ कि बेरंग सूर्य किरण में सात रंग होते हैं।

एक ही रंग है हर रंग, मिला कर देखो।
अपनी आँखों से हरएक पर्दा हटा कर देखो।
एक बेरंग किरण दूर फ़लक से जो चली ,
मुख्तलिफ़ रंग बिखेरे है वो आकर देखो।

रंगों की ख़ासियत है कि  -

रंग भर दोगे तो तसवीर बोल उठ्ठेगी।
ख़्वाब रँग जाएँ तो तक़दीर बोल उठ्ठेगी।

सात स्वर हैं, और रंग भी सात  हैं।
रंग लाते हैं बहुत गर साथ हैं।

मेरा तो मानना है कि  -
फूल-काँटे, रात-दिन, नेकी-बदी, रंजो-ख़ुशी,
ज़िन्दगी का कैनवस रंगीन होता है बहुत।
याद मैं करता नहीं हूँ, याद आता है बहुत।
ख़ुद किसी दिन आयेगा, मिलती दिलासा है बहुत।   (उर्दू वाले दोस्त 'मिलती'' को 'मिलता ' पढ़ें)

--- वी.सी. राय 'नया'
   
  

Tanha

------ ग़ज़ल - 'तनहा' -------

चाँद तारों के साथ भी तनहा।
भीड़ में जैसे- आदमी तनहा।

चाँद का हुस्न दागदार ? नहीं,
दिल जलाया है उसने भी तनहा।

तारे गिन-गिन के रात काटी है,
पहलू बदला है हर घड़ी तनहा।

बेखुदी का अजीब आलम है,
गुफ्तगू तुझसे हो रही तनहा।

वो जो बिछड़ा तो सोचता है 'नया',
कैसे बीतेगी ज़िन्दगी तनहा।
--- वी. सी. राय  'नया'
 

Monday, 2 July 2012

Chaar Muktak

पेश हैं चार मुक्तक  :-  

बात  उठती है बात चलती है।
बात बढ़ती है तो बिगड़ती है।
बात मानो न मानो रख लो ज़रा,
बात रखने से बात बनती है।

बात करने के लिए हम होंठों का इस्तेमाल करते हैं -
होंठ हिलते हैं , मुस्कराते हैं।
प्यार की राह पे चलाते हैं।
बोल उठते हैं कड़ुआ सच जो कहीं,
इनपे ताले लगाए जाते हैं।

होंठों पर ताले हों तो आँखों से काम लें -
आँख उठती है , आँख झुकती है।
आँख मिलती है, आँख लड़ती है।
आँखों-आँखों में गुफ़्तगू कर लो ,
आँख ही दिल की बात  करती है।

आपके हाथ ताली  बजाने को बेचैन हैं -
हाथ मिलते हैं, हाथ जुड़ते हैं।
हाथ उठते हैं , हाथ पड़ते हैं।
हाथ पर हाथ क्यों धरे बैठा ,
हाथ  तक़दीर  तेरी  गढ़ते हैं।

--- वी. सी. राय  'नया'

Tuesday, 26 June 2012

HISAB

हिसाब 

क्या खोया क्या पाया हमने, आज हिसाब लगाया हमने।
मुट्ठी में ले चंद लकीरें, जीवन अनुपम पाया हमने।
जमा-खर्च के दो कॉलम का खाता एक बनाया हमने।
जो-जो पाया जमा किया, जो खर्च किया दिखलाया हमने।
प्यार-दुलार बड़ों से पाया, उन्होंने जीना भी सिखलाया,
विद्या, अनुभव, संस्कार, सब उन लोगों से पाया हमने।
युवा हुए तो पत्नी पाई, प्रेम ने जीवन को महकाया,
त्याग, समर्पण, सखाभाव, जीवन संबल सब पाया हमने।
खट्टे-मीठे अनुभव पाए , गुड्डे-गुड़िया बच्चे पाए ,
हँसना-रोना  देख-बाँट बच्चों का सब सुख पाया हमने।
मात -पिता की सेवा कर आशीर्वाद ढेरों पाए,
मदद जो की मित्रों दुखियों की, नाम और पुण्य कमाया हमने।
खाता  खोल के आज जो देखा, तो हैरानी होती है,
खाते के हर पेज पे केवल जमा - जमा ही पाया हमने।
खर्च का कॉलम सूना पाकर सोचा क्या कुछ खर्च नहीं ?
खर्च किया क्या? क्या थे लाए, इस पर ध्यान लगाया हमने।
खर्च तो की हैं बस कुछ साँसें, जो लिखवा कर लाए थे,
खोए हैं कुछ अवसर केवल जिनका लाभ न पाया हमने।
क्या खोया क्या पाया हमने, आज हिसाब लगाया हमने।
मुट्ठी में ले चंद लकीरें, जीवन अनुपम पाया हमने।

- वी. सी. राय 'नया'

Friday, 18 May 2012

HINDUSTAANI

क़ौमी एकता व सर्वधर्म समभाव को समर्पित रचना -
------------------ हिन्दुस्तानी --------------------
गर्व है हिन्दुस्तानी हैं हम एक ही ईश्वर की संतान।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब मिल कर हैं हिंदुस्तान।

मज़हब सिर्फ मुहब्बत बांटे मिलकर  बैठे जब इंसान।
आपस में हमको बंटवाता अपने दिल का ही शैतान।

गिरजे में बाइबिल पढ़ देखो या फिर मज्जिद में कुरआन।
गुरूद्वारे की गुरबानी में सुन लो सारे वेद पुरान।

आबे ज़म-ज़म और अमृतसर हैं सारे 'होली वाटर',
श्रद्धा की दुबकी में कर लो घर बैठे गंगा स्नान।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आपस में भाई-भाई,
भाई-भाई को लडवाता राजनीति का ही मैदान ।

ईश्वर अल्ला नाम उसी के, उसके पैग़म्बर है राम,
यीशु मसीह,मोहम्मद साहेब,गुरु नानक जैसे इंसान।

छोटा-बड़ा न कोई यहाँ पर, सब के हक हैं एक समान,
सबको रोटी, सबको कारज देता अपना संविधान।

मिलकर बैठो, सुख-दुख बांटो , बाँट के खाओ जो भी मिले,
माँ का आँचल रहे तिरंगा, मत होने दो लहुलुहान।
----- वी. सी. राय 'नया'
    

Wednesday, 16 May 2012

Panch-tatva

पञ्च - तत्व 


मुक्तक 
पांच तत्वों से मिल कर बना है मकां। 
खुशबुओं से किसी की सजा है मकां।             
जानता तो ये है अपना कुछ भी नहीं,
फिर भी खुद को ही सब मानता है मकां। .               


उन्ही पांच तत्वों की नज़र - एक ग़ज़ल 




मैं सफ़र-दर-सफ़र दर-सफ़र जाऊंगा।
घूम-फिर लूँ तभी अपने घर जाऊंगा।
धरती माँ  है मेरी, जिसने पाला मुझे ,
गोद में उसकी थक कर पसर जाऊंगा।
बुलबुला एक पानी पे है ज़िन्दगी ,
मैं  यहाँ  से  वहां  तैर  कर जाऊंगा।
दिल जला है बहुत, जिस्म गर जल गया,
अग्नि से मैं गुज़र कर निखर जाऊंगा।
आसमानों के आगे जहां और हैं ,
लेके मैं इश्क के बालो-पर जाऊंगा।
छू  न पाए कोई , दिख न पाए कभी ,
बनके खुशबू  हवा में बिखर जाऊंगा।
जिसको ढूंढें सभी पर न पायें कभी ,
मैं विलय हो उसी में संवर जाऊंगा।

--- वी. सी. राय 'नया'

Saturday, 5 May 2012

Ghazal Seekh Jayega

---------------------- ग़ज़ल ---------------------------

जो  करके तुम दिखाओगे वो करना सीख जायेगा। 
नशा कोई करो, बच्चा बिगड़ना सीख जायेगा।

लगाता  दौड़  है  'वाकर' में कोई गोद का बच्चा ,
तो लगता है कि दो ही दिन में चलना सीख जायेगा। 

जो ग़लती कर के खुद माने, अगर उसको नसीहत दो,
वो नेता कि तरह कल से मुकरना सीख जायेगा। 

ये संक्रामक बड़ा है रोग तुम मुस्का के तो देखो ,
जो रोता रहता है वो मुस्कुराना सीख जायेगा। 

करो तारीफ़ उसकी सौ, कमी गर इक 'नया' बोली,
जिसे लड़ना नहीं आता वो लड़ना सीख जायेगा।

वी. सी. राय 'नया'