Sunday, 27 October 2013

Kaisa hai

25 अक्टूबर  को एक तरही मुशायरे में पढ़ी ग़ज़ल आपकी प्रतिक्रियाओं के लिए पेश है -
------------ तरही ग़ज़ल ------------
सजा के पूछ रहा है जहान कैसा है ?
"ज़मीन कैसी है ये आसमान कैसा है?"
चमन में फूल, सदफ़ में गुहर, फ़लक पे नजूम,
सजे हैं देख मुकम्मल जहान कैसा है।
ज़मीन माँ की तरह,  आसमाँ पिता की तरह,
मगर ये फ़ासला इस दरमियान कैसा है ?
नज़र से कर ही लिए उसने प्यार के वादे ,
खुली न फिर भी ज़ुबाँ बेज़ुबान कैसा है ?
किसी के क़त्ल की ख़ातिर बनगा बज्र तेरा ,
अरे दधीच ! तेरा देह दान कैसा है ?
कि मेरे बाद ये ऑंखें किसी की ज्योति बने,
तुम्ही कहो की मेरा नेत्रदान कैसा है ?
ज़मीन ढूँढ रहा था मज़ार के क़ाबिल ,
तो क़ीमतों ने कहा असमान कैसा है ?
मैं होके आया हूँ बीजिंग, वहाँ ये पूछा गया,
जहाँ के मैप में ये ताईवान कैसा है ?
यहाँ तो सब हैं 'नया' दो दिनों के ही मेहमाँ,
भुला दिए हैं जो घर मेज़बान कैसा है ?
--- वी. सी. राय 'नया'

Monday, 14 October 2013

KAAM SE PYAR

--- एक मुसल्सल ग़ज़ल ---

जिसको भी काम  से प्यार है।
ये समझ लो समझदार है।
प्रेम भी उपजा है काम से,
काम से ही ये संसार है।
काम का देव भी एक है,
रति से जिसको बहुत प्यार है।
बिन प्रिय भस्म शिव ने किया,
संयम की क्रोध से हार है।
क्रोध संसार का शत्रु है,
दिख चूका ये कई बार है।
क्रोध को भी जो बस में करे,
ऐसा बलवान बस प्यार है।
काम का दास यदि बन गया,
प्यार बस नाम का प्यार है।
प्रेम है नाम जिसका 'नया',
सबको जोड़े वो उदगार है।
--- वी. सी. राय 'नया'

Sunday, 8 September 2013

KHAZANA

एक मिनी नज़्म आपकी सेवा में पेश है - आपकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा है।
--------------- ख़ज़ाना ---------------------
ख़ज़ाना गाँव में मेरे गड़ा है, क्या किया जाए।
समय के सामने झुकना पड़ा है, क्या किया जाए।
मेरे बेटों ने छोड़ा गाँव सर्विस और बिज़नेस में,
यहाँ हर खेत अब बंजर पड़ा है, क्या किया जाए।
निकल जाती है सारी आय रहने और खाने में,
तक़ाज़ा बीज का आकर पड़ा है, क्या किया जाए।
पढ़ाई यूँ तो स्कुलों में बिल्कुल मुफ़्त है लेकिन,
जो मिड-डे मील में विष आ पड़ा है, क्या किया जाए।
बंधा बैठा अपाहिज झोपड़ी से और खेतों से ,
सफ़र बैसाखियाँ लेकर खड़ा है, क्या किया जाए।
--- वी. सी. राय 'नया'

Tuesday, 6 August 2013

NBT

नवभारत टाइम्स !

लखनऊ में हार्दिक स्वागत व आभार। "मुस्कराइए कि आप लखनऊ में हैं।"
आपकी ही पंक्तियों में थोड़ी सी क़तर-ब्योंत करके प्रस्तुत कर रहा हूँ। अच्छी लगें तो प्रकाशित करें, अन्यथा "गुस्ताखी माफ़"।

आने वाले कल की उमीदें , खरे जो उतरें पहले आप।
गूँगी हो गई हक़ की लड़ाई , शोर उठाएँ पहले आप। 
रिश्वत औ' सौदेबाज़ी को , अब ठुकराएँ पहले आप।
हर परिवर्तन शुरू आपसे , सफ़ल बनाएं पहले आप।

शुरू करें दिन 'नवभारत' से, इसके लिए हैं पहले आप।

--- वी. सी. राय  'नया'

पुनश्च : मै एक सेवानिवृत चीफ़ इंजीनियर हूँ तथा 35 वर्षों से साहित्य सेवा कर रहा हूँ। शीघ्र ही कविता या हास्य-व्यंग्य लेख प्रकाशन के लिए भेजूँगा।

Friday, 26 July 2013

KAKARIYAN

ककड़ियाँ
दोस्तों! अगर 'ककड़ियाँ' से आपको 'लैला की उंगलियाँ व मजनूँ की पसलियाँ' याद आती हैं तो कविता के दोषों की अनदेखी करते हुए कहानी और उसमे 'नया' पहलू देखें। पेश है एक नज़्म जो मैंने 1980 में कही थी।

अबकी गया जो घर, लखनऊ शहर।
बिकती दिखीं ककड़ियाँ वाँ एक दोपहर।

ककड़ियाँ थीं कि पेन्सिल, उंह तुलना ये कैंसिल।
मजनूँ की हैं पसलियाँ, लैला की ये उंगलियाँ।
किस्सा वो याद आया बचपन में जो पढ़ा था,
जिसमे थी रह गई आखिर में एक कसर। अबकी गया जो घर ----

लखनऊ में रहता था एक बीरबल।
दीवान नवाब जंग का था खासो खासतर।
चर्चे की बात उसकी थे अक्लो फ़हम हुनर,
लेकिन तमाम किस्से में आया नहीं ज़िकर। अबकी गया जो घर ----

किस्सा दरअस्ल यों था कि नवाबी के दौर में,
दौलत की थी कमी नहीं इज्ज़त की होड़ में।
नवाब जंग के गुमाश्ते की एक दोपहर,
शुरू फ़सल की ककड़ियों पर पड़ी नज़र। अबकी गया जो घर ----

सौदा वो कर रहा था दो कलदार में,
मुंशी नवाब दोस्त का पहुँचा बाज़ार में।
कर दिया जिसने रुपये चार का ऑफ़र,
ये देख गुमाश्ते ने किये दस थे बढ़ाकर।
दस बढ़ के हुए सौ, जो बढ़े तो हुए हज़ार,
दस हज़ार, बीस हज़ार, तीस हज़ार, साठ हज़ार।
इस तरह बढ़ीं बोलियाँ मासूम ककड़ियों पर,
कि जीत गया मुंशी उन्हें लाख में लेकर। अबकी गया जो घर ----

सुनके ये वाकया नवाब जंग परेशान,
इज्ज़त का मेरी कुछ न गुमाश्ते ने रखा ध्यान,
दौलत है किस काम की बचाकर रखूं जो घर,
बस लाख में इज्ज़त भरे बाज़ार गई उतर। अबकी गया जो घर ----

नवाब दोस्त ने सुना जब वाकया यही,
इनआम देके मुंशी को बात ये कही,
भेजो ककड़ियाँ रख के इक सोने के थाल में,
तोहफ़ा नवाब जंग को, है देखो किस हाल में।

नवाब जंग ने तोहफ़ा किया क़ुबूल भरे दिल,
दो लाख धरे थाल में फिर भी न भरा दिल.
बुलाकर तुरत दीवान को लाने कहा ज़हर,
अब जी के क्या करेंगे जब इज्ज़त गई उतर। अबकी गया जो घर ----

ककड़ियाँ खरीद सके न एक लाख में,
नवाब दोस्त बढ़ गया तोहफ़े से साख में।
सुनके सब वाकया कहा दीवान ने परवर,
इज्ज़त तो बढ़ी आपकी, आया तोहफ़ा नज़र।
दो लाख से रुखसत किया तोहफ़े को आपने,
समझें ख़रीदी ककड़ियाँ हैं दो लाख में.
लेकिन ये आपने न ली हैं घर के वास्ते,
ये तो महज़ शौक़ था कुत्तों के वास्ते।

खिला दीजिये ककड़ियाँ कुत्तों को बुला कर,
मै आम कर रहा हूँ अभी जा के ये ख़बर,
सानी नवाब जंग का नहीं कोई इस शहर,
कुत्तों को जिसके कीमती खाने हैं मयस्सर।
पर आह! वो मासूम ककड़ियों का मुकद्दर,
तारीखी उँगलियों व पसलियों का मुकद्दर,
कुँजड़े का मुकद्दर व मुंशी का मुकद्दर,
इस ताले से उस ताले में दौलत का मुकद्दर।
इस ताले से उस ताले में दौलत का मुकद्दर।

अबकी गया जो घर, लखनऊ शहर।
बिकती दिखीं ककड़ियां वाँ एक दोपहर।
---- वी. सी. राय 'नया'ककड़ियाँ
दोस्तों! एक बहुत पुरानी कहानी (जो मैंने 1953 में अपने हाई स्कूल के कोर्स में पढ़ी थी) का 'नया' रूप देखिये।कविता के दोषों की अनदेखी करते हुए कहानी और उसमे 'नया' पहलू देखिये। पेश है एक नज़्म जो मैंने 1980 में कही थी।

--------------------------------- ककड़ियाँ ---------------------------------
अबकी गया जो घर. लखनऊ शहर। बिकती दिखीं ककड़ियाँ वाँ एक दोपहर।
ककड़ियाँ थीं कि पेन्सिल, उंह तुलना ये कैंसिल। मजनूँ की हैं पसलियाँ, लैला की ये उंगलियाँ।
किस्सा वो याद आया बचपन में जो पढ़ा था, जिसमे थी रह गई आखिर में एक कसर।
लखनऊ में रहता था एक बीरबल। दीवान नवाब जंग का था खासो खासतर।
चर्चे की बात उसकी थे अक्लो फ़हम हुनर, लेकिन तमाम किस्से में आया नहीं ज़िकर।
अबकी गया जो घर ----

किस्सा दरअस्ल यों था कि नवाबी के दौर में, दौलत की थी कमी नहीं इज्ज़त की होड़ में।
नवाब जंग के गुमाश्ते की एक दोपहर, शुरू फ़सल की ककड़ियों पर पड़ी नज़र।
सौदा वो कर रहा था दो कलदार में, मुंशी नवाब दोस्त का पहुँचा बाज़ार में।
कर दिया जिसने रुपये चार का ऑफ़र,ये देख गुमाश्ते ने किये दस थे बढ़ाकर।
दस बढ़ के हुए सौ, जो बढ़े तो हुए हज़ार, दस हज़ार, बीस हज़ार, तीस हज़ार, साठ हज़ार।
इस तरह बढ़ीं बोलियाँ मासूम ककड़ियों पर, कि जीत गया मुंशी उन्हें लाख में लेकर।
अबकी गया जो घर ----

सुनके ये वाकया नवाब जंग परेशान, इज्ज़त का मेरी कुछ न गुमाश्ते ने रखा ध्यान,
दौलत है किस काम की बचाकर रखूँ जो घर, बस लाख में इज्ज़त भरे बाज़ार गई उतर।
अबकी गया जो घर ----

नवाब दोस्त ने सुना जब वाकया यही, इनआम देके मुंशी को बात ये कही,
भेजो ककड़ियाँ रख के इक सोने के थाल में, तोहफ़ा नवाब जंग को, है देखो किस हाल में।
नवाब जंग ने तोहफ़ा किया क़ुबूल भरे दिल, दो लाख धरे थाल में फिर भी न भरा दिल।
बुलाकर तुरत दीवान को लाने कहा ज़हर, अब जी के क्या करेंगे जब इज्ज़त गई उतर।
अबकी गया जो घर ----

ककड़ियाँ खरीद सके न एक लाख में, नवाब दोस्त बढ़ गया तोहफ़े से साख में।
सुनके सब वाकया कहा दीवान ने परवर, इज्ज़त तो बढ़ी आपकी, आया तोहफ़ा नज़र।
दो लाख से रुखसत किया तोहफ़े को आपने, समझें ख़रीदी ककड़ियाँ हैं दो लाख में.
लेकिन ये आपने न ली हैं घर के वास्ते, ये तो महज़ शौक़ था कुत्तों के वास्ते।
खिला दीजिये ककड़ियाँ कुत्तों को बुला कर, मै आम कर रहा हूँ अभी जा के ये ख़बर,
सानी नवाब जंग का नहीं कोई इस शहर, कुत्तों को जिसके कीमती खाने हैं मयस्सर।
पर आह! वो मासूम ककड़ियों का मुकद्दर, तारीखी उँगलियों व पसलियों का मुकद्दर,
कुँजड़े का मुकद्दर व मुंशी का मुकद्दर, इस ताले से उस ताले में दौलत का मुकद्दर।
इस ताले से उस ताले में दौलत का मुकद्दर।
अबकी गया जो घर, लखनऊ शहर। बिकती दिखीं ककड़ियां वाँ एक दोपहर।
---- वी. सी. राय 'नया'
पुनश्च : यदि आपको कहानी का शीर्षक व लेखक का नाम याद आए तो बताने की कृपा करियेगा।


Saturday, 13 July 2013

Sun Lijiye

दोस्तों ! पेश है एक ग़ज़ल जो मैं 20-25 साल पहले ग़ुलाम अली की धुन पर गाया करता था => 'सुन लीजिए' - बताइयेगा पढ़ने में कैसी लगी।
----------------- ग़ज़ल ------------------
दास्ताने ग़म सुनाने आ गया, सुन लीजिए।
जान-दिल के साथ और क्या-क्या गया सुन लीजिए।
चैन दिल का छिन गया, आँखों की नींदें उड़ गईं,
एक जीने की तमन्ना पा गया सुन लीजिए।
जो निगाहे नाज़ की क़ातिल ज़दों में आ गया,
उम्र भर बेमौत ही मारा गया, सुन लीजिए।
आ रही है ये सदा पत्थर का सीना चीरकर ,
कितने अरमानों को दफ़नाया गया, सुन लीजिए।
है 'नया' वक़्ते सफ़र, दीदार का हूँ मुन्तज़िर,
लोग कहने लग गए प्यासा, गया सुन लीजिए।
--- वी. सी. राय 'नया'

Monday, 17 June 2013

Mukhalif

आज समाचारों में दिग्विजय सिंह को कहते सुना कि राजनीति में स्थाई विरोधी कोई नहीं होता। इसने मुझे अप्रैल 1986 में कही एक ग़ज़ल की याद दिलादी जो आपकी खिदमत में पेश है। उन्ही दिनों देश में मिलीजुली सरकार पहली बार बनी थी।
------------- ग़ज़ल -------------
मुख़ालिफ़ मुस्तकिल कोई नहीं है।
यहाँ कमज़ोर दिल कोई नहीं है।
किसे शामिल करूँ मैं काफ़िले में,
कि दिल से मुत्तसिल कोई नहीं है।
मिज़ाजे गर्म कोई, सर्द कोई,
मिज़ाजे मातदिल कोई नहीं है।
लहू आँखों से इतना बह चुका है,
कि ताज़ा ज़ख्मे दिल कोई नहीं है।
सभी हँस कर मिलेंगे हर किसी से,
मिला पर दिल से दिल कोई नहीं है।
चुनू मैं कौन सा गुल खुशनुमा है?
मुकर जाती है गिल कोई नहीं है।
खुदा उनको बचाए बद नज़र से,
रुख़े रोशन पे तिल  कोई नहीं है।
--- वी. सी. राय  'नया'
( मुत्तसिल = सहमत , मातदिल = न गर्म न ठंडा - संतुलित , गिल = मिट्टी )