Sunday, 18 January 2015

aankhen

Delhi Poetree के सभी दोस्तों को नमस्कार।  मैं हिंदी में ही कविता करता हूँ - मुख्यतः ग़ज़लें। कुछ छंदमुक्त कवितायेँ भी कही हैं। यह सिलसिला 36 वर्षों से चल रहा है। दो पुस्तकें 2007 व 2011 में प्रकाशित हो चुकी हैं।   अमित दहिया जी के माध्यम से आप सब से जुड़ रहा हूँ।  पहली प्रस्तुति के रूप में एकदम ताज़ा ग़ज़ल पेश है। कृपया इसकी कमियाँ व सुधार के लिए सुझाव ज़रूर दें।
---------------- ग़ज़ल ----------------
लाख समझाऊँ समझती ही नहीं हैं आँखें।
बस बरसती हैं, फड़कती ही नहीं हैं आँखें।

आईना रोज़ उमीदों से बड़ी देखा है ,
मुझसे तो बात भी करती ही नहीं हैं आँखें।

देख कर हाले ज़माना ये मुंदी जाती हैं ,
तुमको देखूँ तो ये थकती ही नहीं हैं आँखें।

नेत्र जो दान करे, मर के भी दुनिया देखे,
बाद मरने के भी मरती ही नहीं हैं आँखें।

आपसे लड़ने का कोई तो सबब होगा 'नया',
यूँ किसी शक़्स से लड़ती ही नहीं हैं आँखें।
--- वी. सी. राय 'नया'






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Sunday, 17 November 2013

Yaad Hai

1982 में मैंने बहुत ही मशहूर ग़ज़ल की तरह पर दो मतले व कुछ शेर कहे थे, जिनमे हर शेर 'याद है/हैं' से शुरू होता है और 'याद है' रदीफ़ भी है। देखें आपको यह ग़ज़ल कैसी लगती है। 
--------------- ग़ज़ल -------------------
तेरा वो नज़रें चुरा कर मुस्कराना याद है।
"मुझको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।"
है यकीं मुझको तुझे मेरा फ़साना याद है।
दर्द में डूबा हुआ ग़मगीं तराना याद है।
याद हैं लम्हे हसीं जो तेरी क़ुर्बत के मिले,
औ' बिछड़ते वक्त तेरा रूठ जाना याद है।
याद हैं वो रेशमी खुशबू भरी ज़ुल्फ़ें तेरी,
और इक लट का जबीं पर झूल आना याद है।
याद है आँखों में मस्ती की छलकती सी शराब,
और क़ातिल तीर नज़रों से चलाना याद है।
याद है होठों पे ठहरी झांकती हरदम हँसी,
हर अदा को बेसबब तेरा छिपाना याद है। 
याद है संदल की मूरत सा महकता इक बदन,
बाँह में भरने कि अनबोली तमन्ना याद है। 
याद हैं तलवे महावर से रचे नाज़ुक 'नया',
और उन्ही पावों घरौंदों का मिटाना याद है। 
--- वी. सी. राय 'नया'


Sunday, 27 October 2013

Kaisa hai

25 अक्टूबर  को एक तरही मुशायरे में पढ़ी ग़ज़ल आपकी प्रतिक्रियाओं के लिए पेश है -
------------ तरही ग़ज़ल ------------
सजा के पूछ रहा है जहान कैसा है ?
"ज़मीन कैसी है ये आसमान कैसा है?"
चमन में फूल, सदफ़ में गुहर, फ़लक पे नजूम,
सजे हैं देख मुकम्मल जहान कैसा है।
ज़मीन माँ की तरह,  आसमाँ पिता की तरह,
मगर ये फ़ासला इस दरमियान कैसा है ?
नज़र से कर ही लिए उसने प्यार के वादे ,
खुली न फिर भी ज़ुबाँ बेज़ुबान कैसा है ?
किसी के क़त्ल की ख़ातिर बनगा बज्र तेरा ,
अरे दधीच ! तेरा देह दान कैसा है ?
कि मेरे बाद ये ऑंखें किसी की ज्योति बने,
तुम्ही कहो की मेरा नेत्रदान कैसा है ?
ज़मीन ढूँढ रहा था मज़ार के क़ाबिल ,
तो क़ीमतों ने कहा असमान कैसा है ?
मैं होके आया हूँ बीजिंग, वहाँ ये पूछा गया,
जहाँ के मैप में ये ताईवान कैसा है ?
यहाँ तो सब हैं 'नया' दो दिनों के ही मेहमाँ,
भुला दिए हैं जो घर मेज़बान कैसा है ?
--- वी. सी. राय 'नया'

Monday, 14 October 2013

KAAM SE PYAR

--- एक मुसल्सल ग़ज़ल ---

जिसको भी काम  से प्यार है।
ये समझ लो समझदार है।
प्रेम भी उपजा है काम से,
काम से ही ये संसार है।
काम का देव भी एक है,
रति से जिसको बहुत प्यार है।
बिन प्रिय भस्म शिव ने किया,
संयम की क्रोध से हार है।
क्रोध संसार का शत्रु है,
दिख चूका ये कई बार है।
क्रोध को भी जो बस में करे,
ऐसा बलवान बस प्यार है।
काम का दास यदि बन गया,
प्यार बस नाम का प्यार है।
प्रेम है नाम जिसका 'नया',
सबको जोड़े वो उदगार है।
--- वी. सी. राय 'नया'

Sunday, 8 September 2013

KHAZANA

एक मिनी नज़्म आपकी सेवा में पेश है - आपकी प्रतिक्रिया की अपेक्षा है।
--------------- ख़ज़ाना ---------------------
ख़ज़ाना गाँव में मेरे गड़ा है, क्या किया जाए।
समय के सामने झुकना पड़ा है, क्या किया जाए।
मेरे बेटों ने छोड़ा गाँव सर्विस और बिज़नेस में,
यहाँ हर खेत अब बंजर पड़ा है, क्या किया जाए।
निकल जाती है सारी आय रहने और खाने में,
तक़ाज़ा बीज का आकर पड़ा है, क्या किया जाए।
पढ़ाई यूँ तो स्कुलों में बिल्कुल मुफ़्त है लेकिन,
जो मिड-डे मील में विष आ पड़ा है, क्या किया जाए।
बंधा बैठा अपाहिज झोपड़ी से और खेतों से ,
सफ़र बैसाखियाँ लेकर खड़ा है, क्या किया जाए।
--- वी. सी. राय 'नया'

Tuesday, 6 August 2013

NBT

नवभारत टाइम्स !

लखनऊ में हार्दिक स्वागत व आभार। "मुस्कराइए कि आप लखनऊ में हैं।"
आपकी ही पंक्तियों में थोड़ी सी क़तर-ब्योंत करके प्रस्तुत कर रहा हूँ। अच्छी लगें तो प्रकाशित करें, अन्यथा "गुस्ताखी माफ़"।

आने वाले कल की उमीदें , खरे जो उतरें पहले आप।
गूँगी हो गई हक़ की लड़ाई , शोर उठाएँ पहले आप। 
रिश्वत औ' सौदेबाज़ी को , अब ठुकराएँ पहले आप।
हर परिवर्तन शुरू आपसे , सफ़ल बनाएं पहले आप।

शुरू करें दिन 'नवभारत' से, इसके लिए हैं पहले आप।

--- वी. सी. राय  'नया'

पुनश्च : मै एक सेवानिवृत चीफ़ इंजीनियर हूँ तथा 35 वर्षों से साहित्य सेवा कर रहा हूँ। शीघ्र ही कविता या हास्य-व्यंग्य लेख प्रकाशन के लिए भेजूँगा।

Friday, 26 July 2013

KAKARIYAN

ककड़ियाँ
दोस्तों! अगर 'ककड़ियाँ' से आपको 'लैला की उंगलियाँ व मजनूँ की पसलियाँ' याद आती हैं तो कविता के दोषों की अनदेखी करते हुए कहानी और उसमे 'नया' पहलू देखें। पेश है एक नज़्म जो मैंने 1980 में कही थी।

अबकी गया जो घर, लखनऊ शहर।
बिकती दिखीं ककड़ियाँ वाँ एक दोपहर।

ककड़ियाँ थीं कि पेन्सिल, उंह तुलना ये कैंसिल।
मजनूँ की हैं पसलियाँ, लैला की ये उंगलियाँ।
किस्सा वो याद आया बचपन में जो पढ़ा था,
जिसमे थी रह गई आखिर में एक कसर। अबकी गया जो घर ----

लखनऊ में रहता था एक बीरबल।
दीवान नवाब जंग का था खासो खासतर।
चर्चे की बात उसकी थे अक्लो फ़हम हुनर,
लेकिन तमाम किस्से में आया नहीं ज़िकर। अबकी गया जो घर ----

किस्सा दरअस्ल यों था कि नवाबी के दौर में,
दौलत की थी कमी नहीं इज्ज़त की होड़ में।
नवाब जंग के गुमाश्ते की एक दोपहर,
शुरू फ़सल की ककड़ियों पर पड़ी नज़र। अबकी गया जो घर ----

सौदा वो कर रहा था दो कलदार में,
मुंशी नवाब दोस्त का पहुँचा बाज़ार में।
कर दिया जिसने रुपये चार का ऑफ़र,
ये देख गुमाश्ते ने किये दस थे बढ़ाकर।
दस बढ़ के हुए सौ, जो बढ़े तो हुए हज़ार,
दस हज़ार, बीस हज़ार, तीस हज़ार, साठ हज़ार।
इस तरह बढ़ीं बोलियाँ मासूम ककड़ियों पर,
कि जीत गया मुंशी उन्हें लाख में लेकर। अबकी गया जो घर ----

सुनके ये वाकया नवाब जंग परेशान,
इज्ज़त का मेरी कुछ न गुमाश्ते ने रखा ध्यान,
दौलत है किस काम की बचाकर रखूं जो घर,
बस लाख में इज्ज़त भरे बाज़ार गई उतर। अबकी गया जो घर ----

नवाब दोस्त ने सुना जब वाकया यही,
इनआम देके मुंशी को बात ये कही,
भेजो ककड़ियाँ रख के इक सोने के थाल में,
तोहफ़ा नवाब जंग को, है देखो किस हाल में।

नवाब जंग ने तोहफ़ा किया क़ुबूल भरे दिल,
दो लाख धरे थाल में फिर भी न भरा दिल.
बुलाकर तुरत दीवान को लाने कहा ज़हर,
अब जी के क्या करेंगे जब इज्ज़त गई उतर। अबकी गया जो घर ----

ककड़ियाँ खरीद सके न एक लाख में,
नवाब दोस्त बढ़ गया तोहफ़े से साख में।
सुनके सब वाकया कहा दीवान ने परवर,
इज्ज़त तो बढ़ी आपकी, आया तोहफ़ा नज़र।
दो लाख से रुखसत किया तोहफ़े को आपने,
समझें ख़रीदी ककड़ियाँ हैं दो लाख में.
लेकिन ये आपने न ली हैं घर के वास्ते,
ये तो महज़ शौक़ था कुत्तों के वास्ते।

खिला दीजिये ककड़ियाँ कुत्तों को बुला कर,
मै आम कर रहा हूँ अभी जा के ये ख़बर,
सानी नवाब जंग का नहीं कोई इस शहर,
कुत्तों को जिसके कीमती खाने हैं मयस्सर।
पर आह! वो मासूम ककड़ियों का मुकद्दर,
तारीखी उँगलियों व पसलियों का मुकद्दर,
कुँजड़े का मुकद्दर व मुंशी का मुकद्दर,
इस ताले से उस ताले में दौलत का मुकद्दर।
इस ताले से उस ताले में दौलत का मुकद्दर।

अबकी गया जो घर, लखनऊ शहर।
बिकती दिखीं ककड़ियां वाँ एक दोपहर।
---- वी. सी. राय 'नया'ककड़ियाँ
दोस्तों! एक बहुत पुरानी कहानी (जो मैंने 1953 में अपने हाई स्कूल के कोर्स में पढ़ी थी) का 'नया' रूप देखिये।कविता के दोषों की अनदेखी करते हुए कहानी और उसमे 'नया' पहलू देखिये। पेश है एक नज़्म जो मैंने 1980 में कही थी।

--------------------------------- ककड़ियाँ ---------------------------------
अबकी गया जो घर. लखनऊ शहर। बिकती दिखीं ककड़ियाँ वाँ एक दोपहर।
ककड़ियाँ थीं कि पेन्सिल, उंह तुलना ये कैंसिल। मजनूँ की हैं पसलियाँ, लैला की ये उंगलियाँ।
किस्सा वो याद आया बचपन में जो पढ़ा था, जिसमे थी रह गई आखिर में एक कसर।
लखनऊ में रहता था एक बीरबल। दीवान नवाब जंग का था खासो खासतर।
चर्चे की बात उसकी थे अक्लो फ़हम हुनर, लेकिन तमाम किस्से में आया नहीं ज़िकर।
अबकी गया जो घर ----

किस्सा दरअस्ल यों था कि नवाबी के दौर में, दौलत की थी कमी नहीं इज्ज़त की होड़ में।
नवाब जंग के गुमाश्ते की एक दोपहर, शुरू फ़सल की ककड़ियों पर पड़ी नज़र।
सौदा वो कर रहा था दो कलदार में, मुंशी नवाब दोस्त का पहुँचा बाज़ार में।
कर दिया जिसने रुपये चार का ऑफ़र,ये देख गुमाश्ते ने किये दस थे बढ़ाकर।
दस बढ़ के हुए सौ, जो बढ़े तो हुए हज़ार, दस हज़ार, बीस हज़ार, तीस हज़ार, साठ हज़ार।
इस तरह बढ़ीं बोलियाँ मासूम ककड़ियों पर, कि जीत गया मुंशी उन्हें लाख में लेकर।
अबकी गया जो घर ----

सुनके ये वाकया नवाब जंग परेशान, इज्ज़त का मेरी कुछ न गुमाश्ते ने रखा ध्यान,
दौलत है किस काम की बचाकर रखूँ जो घर, बस लाख में इज्ज़त भरे बाज़ार गई उतर।
अबकी गया जो घर ----

नवाब दोस्त ने सुना जब वाकया यही, इनआम देके मुंशी को बात ये कही,
भेजो ककड़ियाँ रख के इक सोने के थाल में, तोहफ़ा नवाब जंग को, है देखो किस हाल में।
नवाब जंग ने तोहफ़ा किया क़ुबूल भरे दिल, दो लाख धरे थाल में फिर भी न भरा दिल।
बुलाकर तुरत दीवान को लाने कहा ज़हर, अब जी के क्या करेंगे जब इज्ज़त गई उतर।
अबकी गया जो घर ----

ककड़ियाँ खरीद सके न एक लाख में, नवाब दोस्त बढ़ गया तोहफ़े से साख में।
सुनके सब वाकया कहा दीवान ने परवर, इज्ज़त तो बढ़ी आपकी, आया तोहफ़ा नज़र।
दो लाख से रुखसत किया तोहफ़े को आपने, समझें ख़रीदी ककड़ियाँ हैं दो लाख में.
लेकिन ये आपने न ली हैं घर के वास्ते, ये तो महज़ शौक़ था कुत्तों के वास्ते।
खिला दीजिये ककड़ियाँ कुत्तों को बुला कर, मै आम कर रहा हूँ अभी जा के ये ख़बर,
सानी नवाब जंग का नहीं कोई इस शहर, कुत्तों को जिसके कीमती खाने हैं मयस्सर।
पर आह! वो मासूम ककड़ियों का मुकद्दर, तारीखी उँगलियों व पसलियों का मुकद्दर,
कुँजड़े का मुकद्दर व मुंशी का मुकद्दर, इस ताले से उस ताले में दौलत का मुकद्दर।
इस ताले से उस ताले में दौलत का मुकद्दर।
अबकी गया जो घर, लखनऊ शहर। बिकती दिखीं ककड़ियां वाँ एक दोपहर।
---- वी. सी. राय 'नया'
पुनश्च : यदि आपको कहानी का शीर्षक व लेखक का नाम याद आए तो बताने की कृपा करियेगा।